मेरी नजर मेरे
आसरे से …
सामने वाले आशियाने
पर गयी …
झट से उठ
सड़क पर आ गया …
आवाजें भी लगाई …
आवाज कानों तक ना गयी
शहरों में पता ना लोग
क्यों कान,आंख बन्द करके रखते है
चार्ज तो ना लगा आजतक
मेरी खुली आंखों, खुले कानों का
मेरा चिल्लाना बेकार गया …
साहस जुटा लांघ दी चारदीवारी …
चढ गया सीढ़ियॉ …चमचमाता मार्बल …
एक सुन्दर ,प्यारी कमेड़ी
दीवार और कीमती कांच
के बीच जंग जिन्दगी की लड़ रही थी
दो बार का प्रयास …हाथ ना आयी …
कितनी कोमल वो …थी …
तीसरी बार हाथों में गौर से देखा
त्वचा छिली हुई ,पंखें बिखर गयी ना जाने कितनी… आंखों में पानी …
ले गया छत पर …वो अब हाथों में ना रहना चाहती थी …
मैनें अपने हाथ हवा
में फैला दिये …मेरे पास से दो बार निकली
… मैनें तो आशीर्वाद जाना … दुआयें मानीं
दी ही होंगी … छ्त के चारों तरफ
रही कुछ वक्त …शायद कुछ भूल गयी हो …
फिर नजरों से ओझल ……
मुझे छ्त पर देख …एक शब्द सुना
बेटे आवाज लगा कर घर में आना चाहिये …
कान ,आंखें खोल कर घर में रहना चाहिये ………………
ज्यादा बहस का आशिक ना मैं
जिन्दगी के आगे नियमों के मायने ना ……………………………………BENIWAL
आसरे से …
सामने वाले आशियाने
पर गयी …
झट से उठ
सड़क पर आ गया …
आवाजें भी लगाई …
आवाज कानों तक ना गयी
शहरों में पता ना लोग
क्यों कान,आंख बन्द करके रखते है
चार्ज तो ना लगा आजतक
मेरी खुली आंखों, खुले कानों का
मेरा चिल्लाना बेकार गया …
साहस जुटा लांघ दी चारदीवारी …
चढ गया सीढ़ियॉ …चमचमाता मार्बल …
एक सुन्दर ,प्यारी कमेड़ी
दीवार और कीमती कांच
के बीच जंग जिन्दगी की लड़ रही थी
दो बार का प्रयास …हाथ ना आयी …
कितनी कोमल वो …थी …
तीसरी बार हाथों में गौर से देखा
त्वचा छिली हुई ,पंखें बिखर गयी ना जाने कितनी… आंखों में पानी …
ले गया छत पर …वो अब हाथों में ना रहना चाहती थी …
मैनें अपने हाथ हवा
में फैला दिये …मेरे पास से दो बार निकली
… मैनें तो आशीर्वाद जाना … दुआयें मानीं
दी ही होंगी … छ्त के चारों तरफ
रही कुछ वक्त …शायद कुछ भूल गयी हो …
फिर नजरों से ओझल ……
मुझे छ्त पर देख …एक शब्द सुना
बेटे आवाज लगा कर घर में आना चाहिये …
कान ,आंखें खोल कर घर में रहना चाहिये ………………
ज्यादा बहस का आशिक ना मैं
जिन्दगी के आगे नियमों के मायने ना ……………………………………BENIWAL
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