Sunday, 12 May 2013

खुली हों पलकें

आदत नजर

झुका कर चलने की ना

राहों पर ...

खुली हों पलकें

नजर तो आ ही जाता है ...

कुछ दिल को छू जाता है

कुछ दिल को कह जाता है

मौसम का मिजाज़ भी

पलभर में बदल जाता है

सड़क के किनारे नज़रें

टिक गयी दो पेडो के

बीच एक चद्दर का सहारा

तेज हवा का झोंका मेरी आँखों में रेत भर गया

संभाल कर खुद को देखा

देख प्राण से निकल गए मेरे

हवा ले गयी अपने साथ छत

उनके घर की …

दो छोटी जिंदगीयां ...

एक बड़ी जिन्दगी के सहारे

कचरे से भरे दो थैले

तेज गरजा ... कड़का …

आसमान में बिजली की तेज़ आवाज

बड़ी -बड़ी बुन्दें खड़ा हो सहारा ले लिया मैनें भी उसी पेड़ का

तेज़ ठण्डी हवा के थपेड़े … यूँ कहूँ सब डरावना …

दोनों माँ के लीपट गये …माँ ने अपने सर से

उतार दुपट्टा ढक लिया अपने लालों को…

कम्पकप्पी छुट गयी … माँ की …

बाल बिखर गये …फिर भी …

अलग ना किया जिगर से अपने टुकड़ों को ………………………… BENIWAL

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