Tuesday, 14 May 2013

एक झुंड

एक झुंड गुजरा …
मेरे घर के आगे से
औरतों का …
हँसती , बातें करतीं
सर पर तसला …
तसले में औजार …

उनमें से कुछ को
मेरी नजरें जानती
मैं पूछ बैठा अपनी माँ से
ये औरते कहाँ जा रहीं है
नरेगा में पसीना बहाने जा रहीं है
गाँव की कांकड़ में ……

माँ इनके श्रीमान …क्यों ना जाते उस ओर
बेटा ठेकों ,पीपलों ,नुक्कड़ों पर कोन रहे ……
ताश कोन पीटे ,बेवड़ा कोन बने …
आते-जाते को कोन ताके …
मेरा जाना हुआ शहर की ओर तो
ये तस्वीरे नजर आ ही गयी …
राजू चाचा ,धर्मपाल ताऊ ,रामफल भाई जी …
माँ की बतायी हर बात …सौ का तोड़ हुई …

नजर बस की ताकी से गाँव की कांकड़ पर गयी …
कुछ दुर कड़कड़ाती धुप में मिट्टी पलटती तस्वीरें
पसीना पौंछती तस्वीरें
जल्दी आ गया शहर से निपटा अपने धन्धें …
सुरज ढलने से पहले ही …

एक शोर सुना आंगन से चौखट पर आया …
वो ही तस्वीरे देखा जिन्हें सूरज की लाली के साथ
तसले भरे हुये घास-बालन से …
माँ आना …माँ बोली …
ये देख बेटा दिनभर बहाया पसीना …
ले आयी साथ बालन …
कच्ची ना रह जायें रोटीयाँ …
अभी हुकूमत भी बाकी है बेटा उन श्रीमानों की …
उन बेवड़ो कीं …कमाई में से भी कट कर आयेगा …
जब आयेगी कमाई बैंक में बेवड़ा साथ जायेगा …
मिलते ही आधे तो वो ही उड़ा ले जायेगा …………………………BENIWAL

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