Saturday, 11 May 2013

सुलगते धोरों

सुलगते धोरों
में हल,हलधर ,हलवाहक
लगें रहते हैं
वैशाख ,जैष्ठ …
आसरा दिन गुजारने का
खेजड़े के रुख़ नीचे झोपड़ी
एक कोने में रखा मटका
गीत गाती लू ……
हल की नोक से ऊड़ती धूल …
टपकता पसीना …
इंतजार किरणें सीधी होने का …
सब्र का दुसरा नाम हलधर
मालूम उसे भी है
ये जमीन सुलगती क्यों है …
पता है उसे कूलर की हवा का,
पर सो जाता है खेजड़े की ओट में
फ्रिज के ठंडे पानी का ,
पर पी लेता है मटके का पानी
ऐसी कमरों का ,
मखमली चदरों का ……
पर सो जाता है जलती रेत पर
लजीज खाने का
पर खा लेता एक एक प्याज
सुखी रोटी
धरती माँ की
इज्जत आबरू का रखवाला है
अपनी का का लाडला है वो …
हमारी बंजर आखों में कुछ भी हो
पागल ,गंवार,अनपढ,मूर्ख
ना जाने कितने नाम दे रखे है हमनें
उसे तो ये बादल ,आंधी ,तूफान,
सूरज , पाला ,,,,,,,,,,,,ना जाने कितने दुश्मन है
ये एकेला …
हम तो मत सता्यें …तरसायें इसको …
हम खुदा ना है …………………………………………………BENIWAL

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