Sunday, 12 May 2013

समाजसेवी

मामूली  वक्त में 
अंधाधुंध तरीके से 
लुट कर हमें ...
समाजसेवी 
बनते लाखों  चहरे ...
रख  देते है 
कुछ रंगीन कागज़ 
बेबस तस्वीरों के हाथों में 
ठेका ले लेते है समाज 
संवारने का ....
ना जुबान सही न नजरें  
वो भी वाकिफ है 
कागाजों  के दम पर 
समाज ना संवरते  है 
जिद्द तो देखो इनकी ...
जिन्होंने कई पीढियाँ 
कर दी समाज के हवाले ...
लोहा कूटकर ,लकड़ी सँवार  कर 
हल जोत कर ,बाल सँवार  कर 
झाड़ु लगा कर , कपड़ा सिलकर 
पत्थर सँवार कर  .............. ये क्या है 
अगर वो समाज सेवा है तो ............................BENIWAL

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