ॠतु कोई सी
भी हो …
मौसम कैसा भी हो …
आंधी- तूफान ,सर्दी - गर्मी
बरसात या फिर हो सुखा
जब गुजरता हूँ उँची गली से
टिक-टिक की आवाज आती रहती है
प्यारी भाषा, हँसते मुखड़े ……
अनजान तो समझे मदारी का खेल
हम वासी हैं वहाँ के सो सब जानें …
मुकाबला चला आ रहा है …
राणा के वक्त से अबतक
दोनों के दरमियान …
लुहार लोहे को लाल करता है
लोहा लुहार को लाल कर देता है
लाल सुर्ख़ लोहा देख लुहार हँसता है
लाल सुर्ख मुखड़ा देख लोहा हँसता है
हार मानने को तैयार ना एक भी
एक रंग बदल लेता है …
एक पसीने से तर हो जाता है …
कभी - कभार ठण्डी रातों में भी टिक-टिक का
संगीत सुनाई देता है …
लोहे का दर्द तो जान लिया है आज
उसके अपनों ने …
तकनीकी का सहारा मिल गया है उसे तो आज…
कितना खुश है वो आज
हरा ना पाया वो लुहार को …
वो तो आज भी बैठा है
गाँव-शहर की गलीयों
अपनों के इंतजार में
उसका भी कोई दर्द जाने
राणा की तरह उसे भी कोई अपना माने ……………BENIWAL

No comments:
Post a Comment