Wednesday, 24 April 2013

आज अपने वतन
की हवा पानी
खाकर
बगावत अपने ही
वतन की करता हुँ
दुसरे मुल्कों
की वाहावाही
दिल खोल कर करता हुँ
खुद की हिम्मत
ना दो कदम
चलने की …
दुसरों की चाल
पर शक करता हुँ
खुद से लड़कर
देख
पता चल जायेगी
असलियत क्या
इस धरा पर
बेवजह शोर
ना मचा
रोक कौन रहा है राह तेरी
कुछ बदलने की है चाहत तो आना बाहर
पालतु पशु बनकर मत भौँक
आवारा पशु भी बहुत कुछ कर जाते है
आशिक आशिकी पर मिट सकते है
हालात सुधारने में तो बहादुर ही काम आते है …
उतर कर देख तो मैदान में
देखते है
साथ कौन नही आता है
परवाह अगर है वतन की
या तेरे पास फालतू शब्दों का गुब्बार है
तेरी जरुरत है
इस वक्त …अब देर ना कर

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